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Sunday, September 27, 2015

ना जाने क्यूँ


ना जाने क्यूँ

इक छवि पलकों की कोर तक आके जा रही है।
दूर खड़ी हो अधरों से खुद ही मुस्कराए जा रही है।
प्यारी सी मनमोहक अदा लिए मन को रिझा रही है।
ना जाने क्यूँ फिर भी पास आने से हिच किचा रही है।

तुम बांधो तारीफों के पूल फिर हो के खुश भी क्या करना।
जब तुम ही हासिल नहीं जग में तो ऐसे जहाँ का क्या करना।
अब आके गले लगाले मौत फिर घुट घुट जी के क्या करना।

नदी के मुहाने पे खड़ा सोचता हूँ की वो धारा कब आएगी 
जब लाएगी चैन ओ सुकून और ज़िन्दगी महकाएगी 

खुदा करे वो दिन जरूर आये और मेरे इस सपने को साकार कर जाए 
या तो नदी ही किनारे से दो चार हो जाए या खुद किनारा ही नदी में समा जाए 

रचियता : आनंद कवि आनंद 




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पेट की भूख मुझे सोने नहीं देती


पेट की भूख मुझे सोने नहीं देती

आँखों की शर्म मुझे रोने नहीं देती।

पेट की भूख मुझे सोने नहीं देती।।

किस से गम छुपाऊँ और किस को घाव दिखाऊं 
इस पेट काटती भूख को कैसे मैं बहलाऊँ 

समझ नही आता मुझे क्यों दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती 
सुलगती भूख की मुलाक़ात रोटी के टुकड़े से अक्सर नहीं होती 

इंसानियत बेचकर खा गया इंसान, हम मज़लूमों पर उनकी निगाह अक्सर नहीं होती 
बेसहारा निराश्रित भूख से बिलबिलाते चेहरों पे, दर्द की शिकन रह गुज़र नहीं होती 

रचियता : आनंद कवि आनंद 



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Saturday, September 26, 2015

हकीम से ही ठन गई

हकीम से ही ठन गई

ये सुनकर तो मेरी भौंहे तन गई।
उस नाकारा हकीम से ही ठन गई।

जो मेरी बिमारी को लाइलाज बताता है।
मोहब्बत नाम का रिवाज़ बताता है।

अब क्या करूं सारे ज़माने से दुश्मनी कैसे मौल लूँ।
अब हो गई मोहब्बत तो उसे तराजू में कैसे तौल लूँ।

ऐ ज़माने तू ही बता कोई कैसे जिए चला जाए?
जब खरामा खरामा इस दिल का सुकून चला जाए?

रचियता : आनन्द  कवि आनंद 


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