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Friday, January 30, 2015

वक़्त

वक़्त 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
वक़्त का नवाब भी है ये आदमी
आदमी ही सत्य को पहचानता 
आदमी ही धर्म को है मानता 
जानता है राम को ये आदमी
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
आदमी ही झूठ को तराशता
आदमी ही सत्य को नकारता 
स्वीकारता है "काम" को ये आदमी 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
आदमी ही आदमी को मारता 
आदमी ही जिंदगी संवारता 
वीरता का नाम भी है आदमी 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
आदमी ही आइना समाज का 
वो रक्षक भी है नारी की लाज का
यहाँ भी बदनाम है यह आदमी 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
आदमी ही कायरता का रूप है 
आदमी ही मौत का स्वरूप है 
रूप है भगवान का ये आदमी 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
   वक़्त का नवाब भी है ये आदमी
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015
Email : anandkavianand@gmail.com

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Wednesday, January 28, 2015

बेवफाई

बेवफाई 
होठों से लगाके पी लूं, तू वो जाम ही नहीं 
सीने पे गुदा के जी लूं, तू वो नाम ही नहीं

बेवफाई का सबब, अब तक जान ना सका 
चेहरे पे लगे मुखौटे को, पहचान ना सका
तूं छू ले हर बुलंदी को, हम बेनाम ही सही 

होठों से लगाके पी लूं, तू वो जाम ही नहीं 
सीने पे गुदा के जी लूं, तू वो नाम ही नहीं

मायूसी का आलम, हमें जीने नहीं देता 
तन्हाई का आलम, हमें जीने नहीं देता 
जिसकी करूँ इबादत, तूं वो राम ही नहीं

होठों से लगाके पी लूं, तू वो जाम ही नहीं 
सीने पे गुदा के जी लूं, तू वो नाम ही नहीं

काली घनी रातों में, अकेला जगता ही रहा मैं
भुला के सब कुच्छ, खुद को ठगता ही रहा मैं
खुशियों से भरदे दामन, ऐसी कोई शाम ही नहीं 

होठों से लगाके पी लूं, तू वो जाम ही नहीं 
सीने पे गुदा के जी लूं, तू वो नाम ही नहीं
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015

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तेरे प्यार में

तेरे प्यार में
लड़का : तेरे प्यार में मैंने जग को भुलाया 
             जग को भुलाया जानम, जग को भुलाया, तेरे प्यार में 
लड़की : मैंने भी प्यार में तेरा संग निभाया 
             तेरा संग निभाया साजन, तेरा संग निभाया, तेरे प्यार में 

लड़की : साँसों की सरगम पिया तुझको पुकारे 
लड़का : बंशी बनाके मुझे होंठों से लगाले 
लड़की : वारी जाऊं तुझपे हाय कैसा नशा छाया, तेरे प्यार में 

लड़का : तेरे प्यार में मैंने जग को भुलाया 
             जग को भुलाया जानम, जग को भुलाया, तेरे प्यार में 
लड़की : मैंने भी प्यार में तेरा संग निभाया 
             तेरा संग निभाया साजन, तेरा संग निभाया, तेरे प्यार में 

लड़का : पागल हुआ मन मेरा शराबी सा झूमता 
लड़की : बेकाबू हुआ मन मेरा, प्यार तुम्हे चूमता 
लड़का : घूमता जहान सारा, ये कैसा नशा छाया, तेरे प्यार में 

लड़का : तेरे प्यार में मैंने जग को भुलाया 
             जग को भुलाया जानम, जग को भुलाया, तेरे प्यार में 
लड़की : मैंने भी प्यार में तेरा संग निभाया 
             तेरा संग निभाया साजन, तेरा संग निभाया, तेरे प्यार में 
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015
Email : anandkavianand@gmail.com
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मुझे छू ना ना सनम

मुझे छू ना ना सनम

मुझे छू ना ना सनम, तुझे तेरी जान की कसम 
मेरी जान की कसम, मैं मर जाऊँगी, हाय मैं मर जाउंगी
मेरे दिल की धड़कन बढ़ती 
मेरी साँस तेज़ सी चलती 
ना नज़र तेरे से हटती, मैं मर जाऊँगी, हाय मैं मर जाउंगी
ना दिल पे काबू रहता 
मेरा जोबन दरिया बहता 
मेरा रोम रोम ये कहता, मैं मर जाऊँगी, हाय मैं मर जाउंगी
जब प्रेम ज्वाला सुलगे,
साँसों की लड़ियाँ उलझे 
प्रेम बीज़ जब उपजे, तो मैं मर जाऊँगी, हाय मैं मर जाउंगी
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015-16
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मुझे छू ना ना सनम
  

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सड़क पे जन्मे बच्चे की पुकार डॉक्टर से

सड़क पे जन्मे बच्चे की पुकार डॉक्टर से
सुन रहा है ना तू, रो रहा हूँ मैं
सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं
प्रसव पीड़ा से हांफती कान्फ्ती सी, मेरी माँ
गरीबी और कुपोषण से हारती सी, मेरी माँ
देव तुल्य डॉक्टरों को पुकारती, मेरी माँ
जिंदगी की भीख मांगती, मेरी माँ
सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं……………1
निर्दयता और निर्लज्जता की, सारी सीमा पार कर दी
दीन हीन मरणासन्न माँ, ज़बरदस्ती बाहर कर दी
डॉक्टरों के आचरण की, इज्जत तार तार कर दी
ह्या शर्म बेच खाई, मानवता भी दूर कर दी
सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं……………..2
असहाय बेबस होकर, गिर गई सड़क पर
बेहोशी के आलम में ही मुझे, जन्म दिया सड़क पर
मानवता हुई शर्मसार, एक बार फिर सड़क पर
भारत का भविष्य जन्मा, इस बार फिर सड़क पर
सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं…………….3
काश कि मेरी माँ, इस देश की लाचारी समझ पाती
हृदय हीन पापियों में वासित, भ्रस्टाचार की बिमारी समझ पाती
जिस देश में बच्चे सडकों पे जन्में, उस देश की सच्चाई समझ पाती
काश कि मुझे अपनी कोख में पोषित करने का, निर्णय ले पाती
सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं……………4
सुन रहा है ना तू, रो रहा हूँ मैं
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015-16
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सड़क पे जन्मे बच्चे की पुकार डॉक्टर से

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साजन मैं नहीं नटणी

साजन मैं नहीं नटणी 
प्रेम नदी विच गोता ला ले, साजन मैं नहीं नटणी। 
तेरे बिन ये जिन्दड़ी सूनी, नहीं कटणी वे नहीं कटणी।। 
 मेरे दिल का कोठा सूना, मैं होर किसी को दूँ ना
आजा छू ले प्रेम का पाळा, होर कोई ना छू ना
दो दिन की ज़िन्दगानी यारा, रात दिनां ए घटणी 
साजन मैं नहीं नटणी
मेरी जवानी तेरे नां की,  होंठ मेरे ये तेरी साकी
आजा पी ले प्रेम पियाला, कुछ ना छोड़ूँ बाकी 
मैं तेरी तू साजन मेरा, हर सांस मेरी ए रटणी
साजन मैं नहीं नटणी
ना मुझे होश दिलाइयो, ना मुझे जोश दिलाइयो 
होश फ़ाख़्ता कर दूँगी, जो मुझसे अँग मिलाइयो  
पेंचें लड़ गए दो नैनों के, रब्बा फिर नहीं डटणी
 साजन मैं नहीं नटणी

रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015-16
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साजन मैं नहीं नटणी
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कन्या भ्रूण हत्या

कन्या भ्रूण हत्या
हम हरियाणे के छोरे हैं, दूध के भरे बखोरे हैं 
शिक्षा दीक्षा माड़ी  है, पर कोठी बँगला गाड़ी है 
खेती का अम्बार है, पैसे की भरमार है 
सारे ठाठ बाठ हैं, फिर भी बारह-बाट हैं 
बाकी सारी मौज़ है, पर कुंवारों की फ़ौज़ है 
समाज में सन्नाटा है, छोरियों का घाटा है 
छोरे सबने प्यारे हैं, सबके दुलारे हैं 
छोरी एक आँख भाती नहीं, माँ भी छोरी को ज़नाति नहीं 
सबने चाहिए छोरे वारिस, इसलिए छोरां की होती बारिश 
छोरियां का सूखा पड़ग्या, हरियाणे का रुक्का पड़ग्या 
छोरी कम, छोरे ज्यादा, इब कर लो वारिस पैदा 
छोरी पैदा होती नहीं, शादी म्हारी होती नहीं 
ज़िन्दगी झण्ड है , फिर भी हमने घमण्ड है 
कन्या भ्रूण हत्या यहाँ, रोज रोज होवै है 
मरी हुई इंसानियत, गफलत में सोवै है 
छोरियां की कमी के कारण, दुल्हन खरीदते हैं 
कोख में ही मार छोरी, अपणा ज़मीर बेचते हैं 
छोरे ऊँचे, छोरी नीची, दोयम दर्ज़ा देते हैं 
औरतों को मर्दों से, नीचा ही समझते हैं 
अब भी समय है, समझ जाओ, जाग जाओ 
घर में औरत को, बराबरी का दर्ज़ा दिलाओ  
औरतों को शिक्षित करो, कन्याओं को दीक्षित करो  
माँ, बहिन, बेटी बहू को, इज़्ज़त बख्शा करो 
कन्या भ्रूण हत्या रोको, कन्या की रक्षा करो
फिर देखना हरियाणे में कैसी खुशियां छायेंगी 
मै हरियाणे की बेटी हूँ, कन्या गर्व से दोहराएंगी 
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015-16
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कन्या भ्रूण हत्या

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राशन डिपो धारक की आत्मकथा

राशन डिपो धारक की आत्मकथा (तर्ज़ : यो यो हनी सिंह)

चार बोरी अनाज की, बात है ये राज़ की 
धंधा मेरा चोखा है, मुनाफा भी मोटा है 
थोड़ी सी बेईमानी, थोड़ी सी झूठ है 
थोड़ी सी बदनीयत और लूट ही लूट है 

कोई कुछ बोल जाए, किसी की मज़ाल नहीं 
कभी यहाँ अनाज नहीं, कभी यहाँ दाल नहीं 
जो भी मुंह खोलेगा, उसका कोटा काट दूंगा 
आधा राशन बेच दूंगा, आधा सबमे बाँट दूंगा 

कानूनी दांव पेंच सरे नियम ढीले हैं 
ऊपर से नीचे तक सब धांधली में मिले हैं 
मेरा कोई दोष कोनी, मैं तो सिस्टम का पुर्जा हूँ 
बेईमानी, बदनीयती और भ्रष्टाचार से उपजा हूँ 

मुझको बदलना है तो सिस्टम को बदल डालो 
जागो उठो खड़े हो, राजनीती को बदल डालो 
जब तक ये न होगा, बक- बक करते रहो 
भूख और कुपोषण से रोज रोज मरते रहो 
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आपकी मौजूदगी

आपकी मौजूदगी 

ज़लवा ए हुस्न आपका, रोशन हो गया यह ज़हाँ 
नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ 

आपके आने से पहले, महफ़िल थी कुछ खोई-खोई 
चन्द्रमा की चाँदनी भी, मद्धिम सी थी सोई-सोई 
आपकी मौजूदगी का चर्चा चारों ओर यहाँ 
नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ

खुशबु ए ज़न्नत से, सरोबार थी पहले भी महफ़िल 
आपके दीदार से यहाँ, धड़क उठे लोगों के दिल 
दिल थाम के बैठे हैं हम तो कहीं लग जाए ना यहाँ-वहाँ 
नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ

एक नज़र पाने को आतुर, सब दिल को बिछाए बैठे हैं
कहीं थम ना जाए दिल की धड़कन, साँस थमाए बैठे हैं 
पर आपको मैं क्या कहूँ जो दिल दे बैठे हो वहाँ कहाँ 
नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ

ज़लवा ए हुस्न आपका, रोशन हो गया यह ज़हाँ 
नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ 
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पाती मेरे पी की


पाती मेरे पी की
पाती मेरे पी की पिया से भी प्यारी 
पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी 
बार-बार चूमूँ  तोहे गले से लगाऊं 
प्राणप्यारी पाती कब पिया जी को पाऊं 
पिया बिन जिया मोरा मारे है उडारी 
 पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी 
तकिये के नीचे तेरी सेज बिच्छादूं 
ज़ुल्फों की छाँव करके आ तुझको सुलादूं 
लोरी गाऊं मीठी आए नींद की ख़ुमारी 
पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी 
भोर भए तो तुझे वक्ष में छुपालुं 
दुनिया की जलती नज़र से बचालुं 
आ मेरे अँग लगजा तुझपे सारी ज़िन्दगी वारी 
पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी 
जाने काहे फड़के आज़ मोरी बायीं अँखियाँ 
आये मोहे हिचकी तो ताना मारे सखियाँ 
राम करे पूरवैय्या ले आये खबर तुम्हारी 
पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी 
पाती मेरे पी की पिया से भी प्यारी 
पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी 
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फिर क्या हो?


फिर क्या हो?

गाँव में सजना हो, सजना का अंगना हो, अंगना में छैया हो,
छैया के नीचे मेरे प्यार की मड्डय्या हो - फिर क्या हो?
फिर मैं जानूं या वो जाने - फिर मैं जानूं या वो जाने ....होहो  होहो होहो

वो धीरे से मुस्काएगा  मैं घूँघट में शर्माउन्गी
वो अपने पास बुलाएगा मैं ना में सर हिलाउंगी
वो मुझको खूब मनाएगा मैं कतई हाथ न आऊँगी
वो गुस्सा हो धमकाएगा मैं कतई पास ना आऊँगी 

फिर क्या हो?
फिर मैं जानूं या वो जाने - फिर मैं जानूं या वो जाने ....होहो होहो होहो


सुबह की लाली से पहले मैं सखियों से आँख चुरा लूँगी 
वो खोद-खोद के पूछेंगी मैं सारा भेद छुपा लूँगी 
जो आएगी याद सजन की सीने की आग छुपा लूँगी 
शाम दे ढलते सूरज के संग उसे अपने पासे बुला लूँगी  

फिर क्या हो?
फिर मैं जानूं या वो जाने - फिर मैं जानूं या वो जाने ....होहो होहो होहो

वो गुस्से में सो जाएगा मैं, करके प्यार मना लूँगी  
वो अपनी बात अड़ाएगा मैं बिगड़ी बात बना लूँगी 
वो शह पाके ईतरायेगा मैं नीचे नज़र झुका लूँगी  
वो फिर भी समझ ना पायेगा मैं खुद ही गले लगा लूँगी   

फिर क्या हो?
फिर मैं जानूं या वो जाने - फिर मैं जानूं या वो जाने ....होहो होहो होहो

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पायलिया भाग दो

पायलिया भाग दो 
लड़का  : तेरी दो पैसे की पायलिया पिया रून  झुन रून  झुन करती है
             कहीं हो न जाए जग में ज़ाहिर, मेरी मोहब्बत डरती है 
लड़की : छोटा सा दिल तेरा सांवरी, धक् धक् धक् धक् करता है 
             मै जानूं या तूं जाने, ये बिना बात ही डरता है 

लड़की : सांझ  सवेरे तुझसे मिलकर, सबसे नज़र चुराऊं मैं 
            करके याद मिलन की बातें, मन ही मन शरमाऊं मैं 
लड़का : मेरा भी कुछ हाल यही है, कहीं चैन ना पाऊं मैं 
            बिन तेरे कुछ याद नहीं, इस मन को क्या समझाऊं मैं 
            मेरे प्यार के मूक गवाह ये  आसमान और धरती हैं 
लड़की : मेरी भी दो अँखियाँ साजन तेरे प्यार का दम ही भरती हैं 

लड़का : तेरे प्यार की गहराइयों में, जब से गोता खाया है 
            ना  इस जहाँ ना उस जहाँ, कहीं चैन न पाया है 
लड़की : दिल की हर धड़कन में साजन, तेरा रूप समाया है 
            सूरा बिना ही दिलो दिमाग पे, अज़ीब नशा सा छाया है 
            करके याद मिलन की बेला, मेरी  कजरी अँखियाँ झरती हैं 
लड़का : तेरी कारी-कारी कजरारी अंख, मेरे चैन को हरती हैं 
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घोटाला

घोटाला 
पिछले कुच्छ दिनों से मेरा मन, बहुत मचल रहा है 
लालच का महादानव मुझे उद्वेलित कर, आत्मा को कुचल रहा है 
बेईमानी से कमाने की इच्छा, बलवती हो रही है 
शिष्टाचार और सद्भावना, अन्दर ही अन्दर सती हो रही है 
दिल करता है, भ्रष्ट आचार से, कोई घोटाला कर लूँ
अनीति और हराम की कमाई से, अपना घर भर लूँ 
जनता की खून पसीने की कमाई, पल भर में डकार जाऊं 
खुद पर लगे आरोपों को, पूरी बेशर्मी से नकार जाऊं 
खाकर रकम गरीबों की, बेशर्म और नम्फ्ट हो जाऊं 
सब इल्जामों पे मिट्टी डाल, कुम्भकर्णी नींद सो जाऊं
ये "थर्ड रेट" आन्दोलनकर्ता मेरा क्या कर लेंगे 
अपने खिलाफ मुंह खोलने वाले, एक एक को धर लेंगे 
हार , बेइज्जती और सजा के बावजूद भी, नहीं आऊंगा बाज़ 
करके झूठे वादे धोखे, पांच साल बाद, फिर पहनूंगा ताज़ 
घपले और घोटालों के फ़ेरहिस्त में, अपना नाम लिखवाऊंगा 
करके कायम अराजकता, फिर धृतराष्ट्र हो जाऊँगा
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दँगा

दँगा - भाग 1


रातों रात जाने क्या हुआ कि शहर भर में दँगा हो गया 

जन मानस से ले जनप्रतिनिधि तक हर कोई नंगा हो गया 
किसी की किस्मत तो किसी की अस्मत, दाँव पर लग गई 
शहर फूँक कर जालिमों की आँख गाँव पर लग गई 
शहर दर शहर, गाँव दर गाँव, मौत के कारिन्दे दनदनाने लगे 
लालच के भूखे भेड़िये, लाशों पर बैठकर रुपये बनाने लगे 
अधकच्ची रोटी और लाश एक ही तंदूर में जल गई 
दोनों चीज़ इकट्ठी सेंकने की नयी परम्परा चल गई 
लावारिश बचपन, तबाह जवानी, उदासीन खँडहर शहर के प्रतीक हो गए
जिनको पड़े थे लाले रोटी के, वे गरीबी के दो कदम और नज़दीक हो गए 


मैं कायर नहीं कि ये सब देखता रहूँ 
इतना उदार नहीं कि ये सब सहता रहूँ 
खून खौल उठा है मेरा यह मंज़र देखकर 
धर्म के नाम पर इंसानियत का खून देखकर 
मैंने तुरत फुरत एक साहसी निर्णय ले डाला 
बीवी बच्चे, नकदी नामा, एक एक कर सम्भाला 
अबेर की न देर की, पहली ट्रेन पकडली 
एक नया शहर, एक नया गाँव, एक नयी डगर की सुध ली 


राजनीति, उठा-पटक, साम-दाम, दण्ड-भेद 
अल्हा-ताला, राम-नाम, श्याम-अली, खेद-खेद 
तोहमद-इल्ज़ाम, झंडे-डंडे, साथ-साथ 
मिटते रहे, बिकते रहे साबूत हाथों हाथ 

                                            दँगा - भाग 2

अमन-चैन लौट आया, लौट आई और एक जाँच 
निश्चिन्त हुआ हर एक, साँच  को है अब क्या आँच 
पूरसूकून मैं भी लौटा अपने शहर बिलकुल अज़नबी की तरह 
माकूल नज़र से तौला हर किसी को सच्चे मज़हबी की तरह


रिक्शा वाले से किराया तय ठहराने को ज्यूं ही आगे बढ़ा 
देखता हूँ की वो मेरी ही तरफ़ आ रहा है चढ़ा 
मैं घबराया, रिक्शा वाला मुस्कराया, हाथ सलाम में उठाये हुए 
मैं तो और भी ठिठक गया अपनी पोटली बगल में दबाये हुए 
मेरी आँखों में झांकते अजनबीपन ने रिक्शा चालक की मुस्कान छीन ली 
तब जाकर मेरे शक्की मन ने चैन की साँस ली 
रास्ते भर मैं उचक उचक कर कूचे गली मोहल्लों के निशान तलाशता रहा 
रस्ते में ड्यूटी पर तैनात पुलिसियों से रिक्शा चालक की निशानदेही करवाता रहा 
मुकाम आने तक अपने मन को खुद ही ढ़ाणढ़स बँधाता रहा 
रियर व्यू मिरर में रिक्शा वाले से खुद ही नज़रें चुराता रहा
ना जाने क्यों मुझे रिक्शे वाले की नीयत पर शक हो रहा था 
मुझे देख कर उसकी आँखों में जो उभरी थी चमक, उस पर तो और भी शक हो रहा था 
या खुदा, हे भगवन किसी तरह नैय्या पार लगादे 
इस काल समान रिक्शा चालाक से निज़ात दिलादे  
कि तभी रिक्शा रुकी, मैं सहमा सहमा काँप गया 
रिक्शा चालक शायद मेरे मन का डर भांप गया 
वह बोला भाई साहब आपने मुझे पहचाना नहीं?
भूल गए? मैं रहमत हूँ, क्या अब भी मुझे जाना नहीं 
मैं खिसियानी हँसी हँस कर रह गया 
फिर से ज़माने की रौ में बह गया 


अब मैं फिर से शेर की तरह दनदनाता फिरता हूँ 
दँगा तूफ़ान की क्या मजाल किसी से नहीं डरता हूँ 
क्या करूँ इन्सान हूँ, अत: फिर से किसी बलवे की बाट जोह रहा हूँ 
अपना तमाम सामान बाँधे, सिरहाने रखकर सो रहा हूँ 
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015



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श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!



श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!

हर नुक्कड़ चौराहे पे, पान की दूकान पर,
भिन्न भिन्न आकार में, भिन्न भिन्न प्रकार में,
आपकी सेवा में उपलब्ध हूँ श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!
आप भी आएं, दूसरों को भी लाएं,
खुद भी खाएं, दूसरों को भी खिलाएं,
क्योंकि सहजता व प्रचुरता में उबलब्ध हूँ श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!
गले और गाल के कैंसर की गारंटी है 
जवानी में ही बुढ़ापे के असर की गारंटी है 
धीरे धीरे गुटक लेता हूँ इंसानों की जान, मुझे गुटखा कहते हैं!
खांसी कफ़ के साथ साथ, दांत भी खराब होंगे 
शारीरिक कमजोरी के संग, गुर्दे और आंत भी खराब होंगे 
मेरे भेजे मुर्दों से तो क्षुब्ध है श्मशान, मुझे गुटखा कहते हैं!
छोटी मोटी विपदा नहीं, साक्षात् काल हूँ मैं,
यम यहाँ, दम वहां, उससे भी विकराल हूँ मैं,
साक्षात् मौत के सामान का प्रारब्ध हूँ श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!
जीवन पर्यंत आपको कंगाल बनाए रखूँगा,
इस बेशकीमती ज़हर का ग़ुलाम बनाए रखूँगा 
आप फिर भी मुझे गुटक रहे हैं, स्तब्ध हूँ श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!
 
 रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015


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राष्ट्रभाषा हिंदी

राष्ट्रभाषा हिंदी
हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा, हिंद है देश हमारा 
चंहुमुखी विकास हो हिंदी का, यही देश का नारा 
आओ मिलकर प्रण करें, हम राजभाषा अपनाएंगे 
मन-वचन और कर्म से हिंदी का मान बढ़ाएंगे 
आज़ादी से पहले का गौरव हिंदी को पुन: दिलाएंगे 
यही महान है ध्येय हमारा, कहती संविधान की धारा 
हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा, हिंद है देश हमारा 
बोलचाल की भाषा से उठकर, कार्यालिक भाषा हो हिंदी 
हिन्दोस्तां के जन-जन की लेखन भाषा हो हिंदी 
सरकारी कार्यालयों में भी, कामकाज़ की भाषा हो हिंदी 
सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों की मातृभाषा हो हिंदी 
हिन्दीं हैं हम, हिंदी है भाषा, गूंजे राष्ट्र हमारा 
हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा, हिंद है देश हमारा 
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर, हिंदी का सम्मान हो 
समझौता हो, या बैठक हो, हिंदी उसकी जान हो,
हर हिंदी का कर्त्तव्य है, हिंदी का उसे ज्ञान हो 
शान हो हिंदी की विश्व में, ऐसा इसका उत्थान हो 
गुणगान करे सारा विश्व, और ब्रहमांड में हो जयकारा 
हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा, हिंद है देश हमारा 
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015

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गठबन्धन

गठबन्धन

बगैर मेरी मर्ज़ी के एक इंच भर भी हिलो नहीं 
चाहे जग रूठे या यारा, मेरे कहे से टलो नहीं 
ग़र संभव नहीं ऐसा, तो तुम्हें समर्थन कैसा?
मैं समर्थन वापस लेता हूँ, वतन की बेहतरी के लिए



मेरे खिलाफ लगे आरोपों पर मिट्टी ढक दीजिये 
लम्बित  पड़े मुकदमों को ताक़ पर रख दीजिये 
ग़र संभव नहीं ऐसा, तो तुम्हें समर्थन कैसा?
मैं समर्थन वापस लेता हूँ, क़ानून  की बेहतरी के लिए

मेरी पार्टी के मंत्री को अमुक विभाग या फलां पद दीजिये 
दूसरी पार्टी के मंत्री को घोषित विभाग तुरन्त रद्द कीजिये 
ग़र संभव नहीं ऐसा, तो तुम्हें समर्थन कैसा?
मैं समर्थन वापस लेता हूँ, मन्त्रालय  की बेहतरी के लिए

मेरे इलाक़े के लिए विशेष पैकेज घोषित कीजिये 
भले ही सरे देश या अन्य प्रान्तों को शोषित कीजिये 
ग़र संभव नहीं ऐसा, तो तुम्हें समर्थन कैसा?
मैं समर्थन वापस लेता हूँ, अपने इलाके की बेहतरी के लिए

अंधेर नगरी चौपट राजा फिर भी समर्थन दिया तुम्हे ताज़ा 
अपनी गद्दी छोड़के राजा वैसा ही नाचो जैसा बजे बाजा 
ग़र संभव नहीं ऐसा, तो तुम्हें समर्थन कैसा?
मैं समर्थन वापस लेता हूँ, गठबंधन सरकार के नैतिक मूल्यों की बेहतरी के लिए
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015
Email : anandkavianand@gmail.com
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